मक्का की विपुल उत्पादन तकनीक

परिचय

दुनिया में मुख्य खाद्यान्न फसलों में गेहूँ एवं धान के बाद तीसरी मुख्य फसल के रूप में मक्का सामने आ रही है। इसका मुख्य कारण है इसकी उत्पादकता - क्योंकि इसकी उत्पादन क्षमता गेहूँ एवं धान से 25-100 प्रतिशत तक अधिक है।<
प्रमुख उत्पादक जिले/क्षेत्र -छिंदवाड़ा, बैतूल, सिवनी


उपयोगिता

मध्य प्रदेश में मक्का:- -

क्र. वर्ष
2002-2003 2007-2008 2012-2013
क्षेत्रफल(हे.) उत्पादकता (किग्रा/हे.) क्षेत्रफल(हे.) उत्पादकता (किग्रा/हे.) क्षेत्रफल(हे.) उत्पादकता (किग्रा/हे.)
1 664000 962 834600 1320 862000 2810
    

खेत की तैयारी -

भूमि का चयन एवं भूमि की तैयारी - बलूई दुमट मिट्टी जिसमें उत्तम जल निकासी वाली भूमि मक्का उत्पादन के लिए उपयुक्त है।

उपयोग किए जाने वाले कृषि यंत्र - हल, बख्खर, पाटा, डोरा, मक्का बुवाई एवं कटाई यंत्र।

उपयुक्त किस्में

कृषि जलवायु क्षेत्र- वर्षा: 800-1000 मिमि , तापमान:11-18 डि.से. (रात में) एवं 30-32 डि.से. (दिन में)

किस्मो का चयन- मध्य प्रदेश के लिये प्रमुख अधिसूचित संकर किस्मे निम्नानुसार है।

क्र. अवधि किस्में जारी करने वाली संस्थान का नाम
1 शीघ्र पकने वाली (अवधि 85 दिन से कम) औसत उत्पादन क्षमता 40 से 50 क्वि./हेक्टर डी.एच.एम.-107 एवं 109 पीला रंग दाना एन.जी.रंगा कृ.वि.वि. हैदराबाद
2 पी.ई.एच.एम.-1 एवं पी.ई.एच.एम.-2 नारंगी रंग दाना भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नईदिल्ली
3 प्रकाश पीला रंग दाना, पी.एम.एच.-5 नारंगी दाना पंजाब कृषि वि.वि. लुधियाना
4 प्रो.368 प्रो.एग्रो
5 एक्स -3342 पायोनियर
6 डी.के.सी.- 7074 पीला, नारंगी दाना मोन्सेन्टो
7 जे.के.एम.एच. - 175 पीला एवं नारंगी दाना जे.के.सीड्स
8 बायो - 9637 बायो सीड्स
9 के.एच. - 5991 कंचनगंगा
10 मध्यम अवधि (95 दिन से 85 दिन) औसत उत्पादन क्षमता 50 से 70 क्वि./हेक्टर एच.एम.-4 नारंगी दाना, एच.एम.-10 पीला दाना, चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
11 एच.एम.-10 पीला दाना, चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
12 एच.क्यू.पी.एम.-1 पीला दाना चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
13 एच.क्यू.पी.एम.-4 पीला दाना चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
14 एच.क्यू.पी.एम.-5 नारंगी दाना चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
15 पी.- 3441 नारंगी दाना पायोनियर सीड्स
16 एन.के.-21 नारंगी सिन्जैन्टा इंडिया
17 के.एम.एच. - 3426 नारंगी कावेरी सीड्स
18 के.एम.एच. - 3712 पीला कावेरी सीड्स
19 एम.एन.एच. - 803 पीला नुजीवीडु सीड्स
20 बिस्को - 2418 पीला बिस्को सीड्स
21 बिस्को - 111 नारंगी बिस्को सीड्स
  देरी से पकने वाली (95 दिन से अधिक) औसत उत्पादन क्षमता 60 से 80 क्वि./हेक्टर  
22 एच.एम. - 11 चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
23 डेक्कन - 105 पीला एन.जी.रंगा कृ.वि.वि. हैदराबाद
24 गंगा - 11 पीला एन.जी.रंगा कृ.वि.वि. हैदराबाद
25 डेक्कन - 103 पीला एन.जी.रंगा कृ.वि.वि. हैदराबाद
26 डेक्कन - 101 पीला एन.जी.रंगा कृ.वि.वि. हैदराबाद
27 एच.क्यू.पी.एम. -4 पीला चैधरी चरणसिंह हरियाणा कृ.वि.वि. हिसार
28 त्रीशुलता पीला, नारंगी दाना एन.जी.रंगा कृ.वि.वि. हैदराबाद
29 बिस्को - 855 पीला, नारंगी बिस्को सीड्स
30 एन.के. - 6240 पाला, नारंगी दाना सिंजैन्टा
31 एस.एम.एच.-3904 पीला शक्ति सीड्स
32 प्रो - 311 प्रो.एग्रो
33 बायो - 9681 बायो सीड्स
34 सीड्टैक - 740 सीड्टैक
35 सीड्टैक - 2324 सीड्टैक

बुवाई प्रबंधन

(क) बोनी का उपयुक्त समय:-

बुआई हेतु 15-30 जून खरीफ मौसम मे एवं रबी मौसम मे अक्टुम्बर माह मे उपयुक्त होगा। जायद के लिये फसल बुआई का समय निश्चित करते समय यह ध्यान रखे की फुल की अवस्था के समय तापमान 35 से.ग्रे. से अधिक न हो

(ख) कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी -

क्र . विवरण कतार से कतार की दूरी से.मी. पौधे से पौधे की दूरी से.मी. प्रति हैक्टर पौधो की संख्या
1 जल्दी पकने वाली 60 20 80000
2 मध्यम अवधि 60 22 75000
3 देर से पकने वाली 75 20 65000

(ग) बोने की गहराई - 3 से 5 सेमी

(घ) बुवाई का तरीका - रिज बेड में कतार से बुवाई


बीजोपचार

  • (क) बीजोपचार का लाभ -बीजों की अंकुरण क्षमता बढ़ जाती है एवं बीज जनित फंफूंदजन्य बीमारियों से सुरक्षा होती है।
  • (ख) फंफूंदनाशक दवा का नाम एवं मात्रा - बीमारी के बचाव हेतु कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम एवं थायरम 2 ग्राम/किग्रा बीज अथवा वीटावेक्स पावर 1 ग्राम/किग्रा की दर से उपचार करे। कीट प्रबंध के लिये एमीडाक्लोप्रीड 70 (डब्ल्यू एस) 5 ग्राम/किग्रा बीज से उपचारित करे जिससे पौधे 30 दिन तक सुरक्षित होगें।
  • (ग) दवा उपयोग करने का तरीका - बीजों को पहले चिपचिपे पदार्थ से भिगोकर दवा मिला दें फिर छाया में सुखाएं और 2 घंटे बाद बोनी करें।

जैव उर्वरक का उपयोग

  • (क) जैव उर्वरकों के उपयोग से लाभ - ये पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने का कार्य करते हैं।
  • (ख) जैव उर्वरकों का उपयोग - 3 कि.ग्रा. पी.एस.वी. एवं 3 कि.ग्रा. एजोटोबेक्टर को लगभग 100-150कि.ग्रा.गोबर की खाद में मिलकार बुवाई के पहले छिडकाव करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं ।

पोषक तत्व प्रबंधन

  • (क) गोबर की खाद/कम्पोस्ट की मात्रा एवं उपयोग - सामान्यतः 6 से 8 टन प्रति हे. की दर से कम्पोस्ट अथवा केंचुआ खाद का प्रयोग बोनी के पूर्व करना चाहिए।
  • (ख) मिट्टी परीक्षण के लाभ-पोषक तत्वों का पूर्वानुमान कर संतुलित खाद दी जा सकती है।
  • (ग) संतुलित उर्वरकों को देने का समय -
  • अवधि पकने के अनुसार पोषक तत्व (कि./हे.) विकल्प - 1 विकल्प - 2 विकल्प - 3
    उर्वरक (कि./हे.) उर्वरक (कि./हे.) उर्वरक (कि./हे.)
    नत्रजन स्फुर पोटाश यूरिया सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश यूरिया सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश यूरिया सुपर फास्फेट म्यूरेट ऑफ़ पोटाश
    शीघ्र 90 40 30 200 250 50 161 87 50 163 125 17
    मध्यम 120 50 30 270 312 50 217 109 50 219 156 50
    देरी 180 60 40 400 375 50 340 130 66 342 188 66

    रासायनिक उर्वरकों की मात्रा मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर देना अधिक लाभप्रद होगा। नत्रजन की एक तिहाई मात्रा एवं स्फुर तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुआई करते समय सरते से कतारों में दें।शेष दो तिहाई में सें एक तिहाई नत्रजन 25-30 दिन पर एवं एक तिहाई 45-50 दिन पर खड़ी फसल में दे।खेत में पानी भरने की स्थिति में एवं निंदाई गुड़ाई में देरी होने पर नत्रजन 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से निश्चित रूप से दें।खड़ी फसल में नत्रजन का प्रयोग निंदाई उपरान्त ही करें।

  • (घ) संतुलित उर्वरकों के उपयोग में सावधनियां:- समय पर संतुलित खाद उचित विधि से दें एवं अधिक खाद का प्रयोग न करें।
  • (ड़) सूक्ष्म तत्वों की उपयोगिता, मात्रा एवं प्रयोग का तरीका: - 25 किग्रा/हेक्टेर जिन्क सल्फेट बोने से पहले छिटकवा विधी से देना चाहिये।

नींदा प्रबंधन

मक्का फसल को शुरूवाती अवस्था मे नींदा रहित होना चाहिये अन्यथा उत्पादन मे कमी आती है। मक्का की फसल में एट्राजीन 1किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर बुवाई के बाद परन्तु उगने के पूर्व उपयोग करे । अन्तरवर्ती (मक्का / दलहन/तिलहन) फसल व्यवस्था में पेंडीमिथिलिन 1.5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बोनी के तुरंत बाद किंतु अंकुरण के पूर्व नींदानाशकों का उपयोग करें। मक्का फसल में चैड़ी पत्तीवालें खरपतवारों की अधिकता होनें पर 30-35 दिन पर 2,4-डी का 1.0 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर उगे हुये खरपतवारों पर छिड़काव कर नियंत्रण किया जा सकता है

रोग प्रबंधन

क्र. रोग का नाम लक्षण नियंत्रण हेतु अनुशंशितदवा दवा की व्यापारिक मात्रा/हे. उपयोग करने का समय एवं विधि
1.पर्ण अंगमारी छोटे गोला/अण्डाकार भूरे कत्थाई रंग के धब्बे बनते है। ज़िनेम/ मिनेब 2.5 - 4 ग्रा./ली. 8 - 10 दिन के अंतराल पर
2भूरी चित्ती पत्तियां तने तथा भुट्टे के बाहरी छिलके पर हल्के पीले रंग के 1.5 मिलीमीटर व्यास के गोलाकार /अंडकार धब्बे बनते जाते है। डाइथेन एम 452 - 2.5 ग्रा./ली. बीमारी के शुरूआत होने पर
3मृदूरोमिल आसिता (डाउनी मिल्डयू) प्रारंभ में निचली पत्तियों पर लम्बवत 3 मिली मीटर चैड़ी पीले रंग की धारियां समानान्तर रूप में बनती है। बाद में ये धारियां भूरे रंग में बदल जाती है। एप्रोन 35 डब्ल्यू. एस. (फंफूंदनाशक) 2.5 ग्रा./किग्रा बीज बीजोपचार

कीट प्रबंधन

क्र.कीटकानामलक्षणनियंत्रणहेतुअनुशंशितदवादवाकीव्यापारिकमात्रा/हे.उपयोगकरनेकासमयएवंविधि
1तना छेदक मक्खीइसके प्रकोप से पौधे कामुख्यप्ररोहकटजानेसेमृतकेन्द्र(डेडहार्ट)बनजाताहैतथापौधामरजाताहै।फोरेट10जी10किग्रा/हे.बोनीपूर्व
2तनाछेदककीटइल्लीयांपहलेपत्तीकोखुरच-खुरचकरखातीहै,जिससेमृतकेन्द्र(डेडहार्ट)बनजाताहै।कार्बोफयूरान3जी10किग्रा/हे.15दिनकीअवस्थामेंपौधेकीपोंगलीमेंडाले।
जिससमयइल्लीपत्तिकोखुरचकर खाती है ।क्लोरोपाईरीफास 20 ई.सी.2 मिली/लीटर