फसल सिफारिशें

खरीफ फसल - तिल

कीट प्रबंधन - तिल

कीट अन्टीगासटा केटालोनलिस
प्रचलित नाम पत्ती मोडक एवं फल्ली छेदक
क्षति
  • इस कीट की इल्लियां प्रांरभिक अवस्था में पत्तियों को खाती है।
  • फसल की अंतिम अवस्था में यह फूलों का भीतरी भाग खाती है।
  • फसल पर पहली बार संक्रमण 15 दिन की अवस्था पर होता है तथा फसल वृध्दि के पूरे समय तक सक्रिय रहता है।
आई.पी. एम
  • सहनशील किस्मों को उगाए।
  • फसल की बुआई जल्दी करें ( जुलाई के प्रथम सप्ताह में )ें।
  • इल्लियों को हाथ से पकड़कर नष्ट करना चाहिए।
नियंत्रण
  • कार्बोरिल 0.25 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण या क्वीनालफॉस 0.05 प्रतिशत का 750 पानी /हे की दर से फूल आने की अवस्था से आरंभ कर 15 दिनों के अंतराल से तीन बार छिड़काव करें।
  • 4 प्रतिशत फोसलीन या 5 प्रतिशत मेलाथीओन या 4 प्रतिशत इल्डोसल्फान चूर्ण का 25 कि.ग्रा./हे की दर से बोनी के 30 एवं 45 दिन बाद दो बार भुरकाव करें।
कीट एसफोनडाइलिया सिसमी
प्रचलित नाम गॉल फ्लाई या तिल की मक्खी
क्षति
  • इस कीट के मेंगट फूल के भीतरी भाग को खाते है और फूल के आवश्यक अंगों को नष्टकर पित्त बनाते है।
  • फल्ली की जगह एक गांठ नुमा मुड़ी हुई विकृति बन जाती है।
  • इसका आक्रमण खरीफ के मौसम में, सितम्बर के महीने में कलियां निकलते समय कीट दिखाई देते है और नवम्बर के अन्त तक सक्रिय रहते है।
आई.पी. एम
  • प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
नियंत्रण
  • कलियां निकलते समय फसल पर 0.03 प्रतिशत डाई मेथोएट या 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस का 650 लीटर पानी में धोलकर प्रति हेक्टेयर के मान से छिड़काव करें।
कीट एचीरोनशिया स्टाइक्स
प्रचलित नाम हाक मोथ
क्षति
  • इल्ली की कीट की हानिकारक अवस्था है।
  • पूर्ण विकसित इल्ली पीले रंग की 100 मि.मी. लंबी होती है। इसके उदरांग के आठवें खंड पर एक नुकीला सुड़ा हुआ सींग रहता है जिससे द्वारा यह आसानी से पहिचानी जा सकती है।
  • इल्लियां पौधों की पत्तियों को काट काटकर चााती है एवं एक इल्ली अनेक पत्तियों को नष्ट करती है।
  • यह एक पौधे से दूसरे पौधे पर पुंहचकर हानि करती है।
  • जब फसल में फल्लियां तैयार होती है तब से फसल के काटने तक यह कीट सक्रिय होता है।
आई.पी. एम
  • नाशी कीटों के अण्डे, इल्ली तथा शंखी इत्यादि को भूमि के उपर लाकर तेज धूप में नष्ट करने हेतु ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई करें ।
  • हानिकारक कीटों की विभिन्न अवस्थाओं को प्रारंभ में ही हाथों से एकत्रित कर नष्ट करें ।
नियंत्रण
  • 8 4 प्रतिशत फोसलीन या 5 प्रतिशत मेलाथीओन या 4 प्रतिशत इल्डोसल्फान चूर्ण का 25 कि.ग्रा./हे की दर से बोनी के 30 एवं 45 दिन बाद दो बार भुरकाव करें।
कीट स्पायलोसोमा आबलिक्या
प्रचलित नाम बिहार की रोएदार इल्ली
क्षति
  • यह एक बहुभक्षी कीट है।
  • इसकी इल्ली के शरीर पर पीले लाल एवं काले रंग के रोग कतारों में पाया जाते है।
  • इसी कारण यह रोमिल या कम्बल कीट के नाम से जाना जाता है।
  • नवजात इल्लियां तिल की पत्तियों को समूह में खाती है।
  • पत्तियां छन्ने की तरह हो जाती है। जिससे पौधे कमजोर हो जाते है और फल्लियां कम बनती है।
  • विकसित इल्ली एक पौधे को खाकर दूसरे पर चली जाती है।
  • फसल पर इसका आक्रमण सितम्बर एवं अक्टूबर माह में अधिक होता है।
आई.पी. एम
  • प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
  • हानिकारक कीटों की विभिन्न अवस्थाओं को प्रारंभ में ही हाथों से एकत्रित कर नष्ट करें ।
नियंत्रण
  • कलियां निकलते समय फसल पर 0.03 प्रतिशत डाई मेथोएट या 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस का 650 लीटर पानी में धोलकर प्रति हेक्टेयर के मान से छिड़काव करें।