फसल सिफारिशें

रोग प्रबंधन - रबी फसल - सरसों

 
रोग स्कोलेरोटिना स्टेम रॉट

हिन्दी नाम स्कोलेरोटिना तना सड़न

कारक जीवाणु

स्कोलेरोटिना स्क्लेरोटीओरम

लक्षण एवं क्षति

  1. तने पर लम्बे पनिहल धब्बे बनते है जिन पर कवक जाल रूई की तरह फैला रहता है।
  2. तना जब कवक जाल से घिर जाता है तो पौधा सूखने लगता है।
  3. ग्रसित तने की सतह पर भूरी सफेद या काली-काली गोल आकृति दिखाई पड़ती है।
  4. पौधे की वृठ्ठि रूक जाती है और बौने होकर पकने लगते है।
  5. रोग के कारण तना फट जाता है।
नियंत्रण

  1. 0.1 प्रतिशत कार्बन्डाजिम का फूल आने के समय 20 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
आई.पी. एम
  1. स्वस्थ बीजों का उपयोग करें।
  2. गर्मी में गहरी जुताई करें।
  3. खेत को साफ रखें।
  4. गेहूँ, धान,मक्का और जौ जैसी फसलें जो रोगग्राही न हो उन्हें उगाए और समुचित फसल चक्र अपनाए।

रोग

आल्टेनेरिया लीफ ब्लाइट

 

हिन्दी नाम

आल्टनेरिया पत्ती झुलसन

कारक जीवाण आल्टनेरिया ब्रासिकी

लक्षण एवं क्षति

  1. पूरी फसल के दौरान क्षति होती है।
  2. फरवरी मार्च में ज्यादा
  3. पत्तियों की ऊपरी सतह पर गोल धारीदार कत्थई धब्बे दिखाई देते है।
  4. ये धब्बे तेजी से बढ़कर वृताकार सकेन्द्री वलय बन जाते है।
  5. रोग बढ़कर तने और फलियों को भी ग्रसित करता है।
  6. ग्रसित फलियों या तो पोची रह जाती है या बीज सकुड़कर छोटा हो जाता है और उनमें तेल का प्रतिशत घट जाता है।
  7. पत्तियां मुरझाकर गिरने लगती है।
नियंत्रण

  1. आईप्रोडियॉन या मेनकोजेब ( डाईथेन एम-45) का तीन या चार बार छिड़काव करें।
    या
  2. 2 ग्राम प्रति लीटर जेनेब का छिड़काव रोग के लक्षण दिखते ही करें।
  3. 2 ग्राम प्रति लीटर मेनकोजेब का छिड़काव करें।
आई.पी. एम
  1. स्वस्थ बीजों का उपयोग करें।
  2. पोटॉश की अनुमोदित मात्रा का ही उपयोग करें।
  3. रोग ग्रसित फसल अवशेषों को नष्ट करें।
  4. खरपतवार नष्ट करें।

रोग

व्हाईट रस्ट

 

हिन्दी नाम õश्वेत किट्ट

कारक जीवाण एल्बूगो कैन्डीडा

लक्षण एवं क्षति
  1. यह रोग दो अवस्थाओं में दिखाई पड़ता है।
  2. आल्टनेरिया झुलसन के बाद जनवरी में यह रोग पहली बार पत्तियों की निचली सतह पर दिखाई पड़ता है।
  3. पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रेग के छोटे-छोटे फफोले दिखाई देते है जो बाद में मिलकर अनियमित आकार के हो जाते है।
  4. इन फफोले के ठीक ऊपर वत्ती की ऊपरी सतह पर भूरे कत्थई रंग के धब्बे हो जाते है जो विकसित होकर फूट जाते है और सफेद चूर्ण के रूप में फैल जाते है।
  5. ग्रसित भाग, तनाआदि फूल कर मांसल हो जाते है जिसके प्रभाव से बीज नहीं बन पाते है।
  6. सूजन के कारण तना झुक जाता है।
  7. यह रोग निषिक्तांडों ध्दारा चिरस्थाई बने रहते है।
नियंत्रण

  1. रोग के लक्षण दिखते ही मेनकोजेब 75 डब्लू.पी. 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से छिड़काव करें।
  2. 6 ग्राम मेटालेक्जिल( एप्रॉन) प्रति किलो बीज से उपचारित करें।
  3. पोटॉश की अनुमोदित मात्रा का ही उपयोग करें।
आई.पी. एम
  1. स्वस्थ बीजों का ही उपयोग करें।
  2. जे.एम.-1 जैसी प्रतिरोधक किस्मों बोयें।
  3. रोग ग्रसित पौधे और अवशेषों को नष्ट करें।
  4. फसल चक्र अपनाए।
  5. रोग ग्रसित फसल के बीज बोनी में न लें।
  6. अत्याधिक सिंचाई न करें।

रोग डाऊनी मिल्डयू

 
हिन्दी नाम मृदुरोमिल आसिता


कारक जीवाण

पेरोनास्पोरा पैरासिटिका

लक्षण एवं क्षति

  1. रोग के लक्षण पत्तियों पर दिखाई पड़ते है।
  2. पहले छोटे छोटे गोलाकार मटमैले भूरे या बैेगनी रंग के धब्बे पत्ती की निचली सतह पर बनते है जो मिलकर आपस में अनियमित आकार ले लेते है जिससे पत्तियां सकुड़ जाते है। और नाजुक होने के कारण फट जाते है।
  3. तना काफी लम्बाई तक सूज जाता है और झुक जाता है।
नियंत्रण

  1. रोग के लक्षण दिखते ही 2 ग्राम मेनकोजेब 75 प्रतिशत डब्लू.पी. प्रति लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  2. 2 ग्राम मेटालेक्जिल प्रति लीटर पानी के साथ छिड़काव करें।
  3. एपरॉन-35 से बीज उपचारित करें और रिडोमिल 0.25 प्रतिशत का छिड़काव बोनी के 60 दिन बाद करें।
  4. बोनी के 80 और 100 दिन बाद रोवरील 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें।
आई.पी. एम
  1. स्वस्थ और प्रमाणित बीजों का उपयोग करें।
  2. प्रतिरोधक किस्मों का उपयोग करें।
  3. खेत में साफ सफाई रखें।
  4. पोटॉश की अनुमोदित मात्रा का ही उपयोग करें।

रोग पाऊडरी मिल्डयू

 
हिन्दी नाम

भभूतिया

  
कारक जीवाण इरीसिफी क्रूसीफेरेरम

लक्षण एवं क्षति
  1. इस रोग का आक्रमण फरवरी या मार्च में होता है।
  2. पौधे की निचली पत्तियों के दोनों ओर मटमैले रंग के धब्बे दिखाई देते है जो बाद में तने और फलियों पर भी फैल जाते है।
  3. अनुकूल परिस्थितियों में धब्बे बढ़ते पूरे पौधे को ढक लेते है और चूर्ण सा फैला देते है।
  4. पौधे बौने रह जाते है और फलियां कम बनती है।
  5. ग्रसित फलियों के बीज सिकुड़े, छोटे होते है। और कुछ हिस्सा खाली रहता है।
नियंत्रण

  1. 1.5 ग्राम कार्बानडजिम प्रति लीटर का छिड़काव करें।
आई.पी. एम
  1. खेत में साफ सफाई रखें।
  2. रोग ग्रसित फसल के अवशेषों को नष्ट करें।
  3. बोनी समय पर करें।
  4. पोटॉश की अनुमोदित मात्रा का ही उपयोग करें।